Thursday, February 19, 2009

तेरी तारीफ़

तू एक चिट्टा कागज़ है
तुझपे ग़ज़ल लिखी जा रही है
इत्मेनान और शौक़ से सुन्ना
कि तेरी तारीफ़ लिखी जा रही है

बिखरती लटें खुलती पलकें
अंगडाई और करवटों के सिलसिले
जाने सुबह को तू जग रही है
या सुबह को तू जगा रही है

बस पल भर ही तुझे देख के
तेरा सुरूर पता नहीं पड़ता
तेरा हुस्न है जाम शराब का
हर झलक पे चढ़ती जा रही है

आज अपने गिले बालों को
छोड़ खुले जो लेहेरने दिया
तो तक़ाज़ा ही भीग जाने का है
मौसम की जो पहली घटा छ रही है

है बेदाग़ तुझे चाँद केह न सके
नूर तुझसा सूरज से भी मुम्किन नहीं
आंखों में तेरी झाँक है दिखता
रौशनी तेरी रूह से आ रही है

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