इस भीड़ में अपना वजूद बनाए रहने वो लिखता था
एक आदमी था जो बस अपना पागलपन सहने को लिखता था
कुछ ईटों का भार था, कुछ पत्त्हर उसपे फेंके थे
इन् बढ़ते तानो की इमारत को बस ड़ेहने वो लिखता था
भर जाते थे जब बर्तन क्रोध से ही उसके मन के सारे
तो बस कागज़ भर पे अपना लावा दे बहने वो लिखता था
बड़ी मुश्किल से बांधे रक्खे थे रिश्तो की उसने धागे
लफ्जों के तेज़ाब से उन्हें साबूत रक्खे रहने वो लिखता था
कश्मकश उसकी ये नहीं थी के अलफ़ाज़ का मोहताज था
बस अपना दर्द सेकने को सियाही देहने वो लिखता था (देहना - बोहत गरम करना)
गुमनाम वो कई अरसे थे तनहा तनहा जो रो के बिसरे थे
उनकी ज़ीनत बचाए रखने शायद चश्मे पहने वो लिखता था
जवाब ढूँढता उनके, जिन सवालों का ही पता नहीं
के अपने जुस्तजू की दास्ताँ न पडे कहने वो लिखता था
एक आदमी था जो बस अपना पागलपन सहने को लिखता था
कुछ ईटों का भार था, कुछ पत्त्हर उसपे फेंके थे
इन् बढ़ते तानो की इमारत को बस ड़ेहने वो लिखता था
भर जाते थे जब बर्तन क्रोध से ही उसके मन के सारे
तो बस कागज़ भर पे अपना लावा दे बहने वो लिखता था
बड़ी मुश्किल से बांधे रक्खे थे रिश्तो की उसने धागे
लफ्जों के तेज़ाब से उन्हें साबूत रक्खे रहने वो लिखता था
कश्मकश उसकी ये नहीं थी के अलफ़ाज़ का मोहताज था
बस अपना दर्द सेकने को सियाही देहने वो लिखता था (देहना - बोहत गरम करना)
गुमनाम वो कई अरसे थे तनहा तनहा जो रो के बिसरे थे
उनकी ज़ीनत बचाए रखने शायद चश्मे पहने वो लिखता था
जवाब ढूँढता उनके, जिन सवालों का ही पता नहीं
के अपने जुस्तजू की दास्ताँ न पडे कहने वो लिखता था