कुछ लम्हे ज़िन्दगी के तेरे साथ जो बिताए,
कुछ लम्हे ज़िन्दगी के तेरी याद में बिताए,
वक्त था ऐसा जिसमे मशगूल हो जाता हु,
मुझसे क्यूँ वक्त का साथ निभाना नहीं होता?
आंखों में तेरी आंखों के तसव्वुर से क़ैद है,
बातों में तेरी बातों से तबस्सुम हर क़ैद है,
यादों की क़ैद में भी बड़े जालिम है यह कैदी,
दिल की हुकुमत से इन्हे छुडाना नहीं होता।
हर नए चेहरे में तेरा चेहरा ढूंढता हु,
नदियों को छोड़ कर मैं क्यूँ सेहरा ढूंढता हु,
लग जाते दिल पे पहरे तेरा नाम जब याद आता,
ज़हन से मुझे बस एक नाम भुलाना नहीं होता।
शेर, ग़ज़ल, नज़म तेरे बारे में लिख चुके है,
कभी कागज़ पे कभी रेत पे, किनारे पे लिख चुके है,
अब चाहते है की दिल से वो सियाही के नक्श मिट जाए,
लेकिन उन पुर्जों को कहीं बहाना नहीं होता।
इतनी कशिश तेरी क्यूँ इस दिल में भर ली मैंने,
इतनी मोहब्बत तुझसे क्यूँ इस तरह कर ली मैंने,
कि अब जानते है हासिल सिर्फ़ सिफर है मुक़म्मल,
फ़िर भी किसी हसीं से दिल लगना नहीं होता।
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