Friday, December 12, 2008

मेरी ज़ात - Meri zaat

रहबर अनाथों को कपड़े दिलाया करते है
फकीरों को खैराती खाना खिलाया करते है
पर हमनें तो ख़ुद को उस ज़ात का पाया
जिसे लोग खैरात में हसाया करते है

दीवानों की दीवानगी का मज़ाक उड़ता है
नादानों की नासमझी का मज़ाक उड़ता है
पर हम में एक शक्स हमें ऐसा मिला
लोग जिसकी समझ का मज़ाक उडाया करते है

पैसो की दुनिया है पैसे नहीं
कमाए बिना खर्चे हम ऐसे नही
मिल गए कुछ एक को जो थोड़े कागज़ के पुर्जे
हमें हमारी औकात बताया करते है

लफ्जों के जाल में लफ्ज़ नहीं मिलते
मन की बातों को शब्द नहीं मिलते
हम से बेहतर बातों वाले जो है मिले हमें
हम खामोशी से खामोशी का साथ निभाया करते है

कोई शकल नहीं कोई आवाज़ नहीं
कोई खुशबु नहीं कोई एहसास नहीं
मिला नहीं जो कोई ख़्वाबों में आनेवाला
हम लफ्जों से अपने ख्वाब सजाया करते है

किसी ने मुझे बातें कम सहने को कहा है
हर पल है खुशी मुझे खुश रहने को कहा है
ऐ खुदा इस दिल का एक ये अरमान पुरा कर
उस शक्स की खुशी के हम अरमान बनाया करते है

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