Saturday, December 20, 2008

ऐ जान-ऐ-ग़ज़ल


बड़ी तमन्ना है, हो सके तो कभी पूरी कर

हंसी ख्वाब बन के मेरी आंखों में उतरना

उस ख्वाब में हम शमा-परवाना बनेंगे

मैं शौक में जलूँगा, तू आरजू में पिघलना

पहचान के चले था मैं अंजाम को आगाज़ से

बस जब तक वो मोड़ न आए हमसे मत बिछड़ना

ऐ जान-ऐ-ग़ज़ल मैं जानता हु तू किसी और की हो जायेगी

मेरी आशीकी नहीं बदलेगी, तेरे इरादे मत बदलना

हमारे लफ्जों की आदत है कि जिसके लिए होते है उनके हो जाते है

कभी अपने खयालो में कोई आहात सुन चौंक मत मचलना

दुनिया ने हमें काम ही दिया है पत्थरों की राह का

राह पे पत्थरो से हम बच्लेंगे, तुम बाग़ में कांटो से संभालना

की खुदा अब हमें समझ बक्शे अब ये मुमकिन लगता नहीं

इस बात को हो सके तो तुम जल्द से जल्द समझना

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