Thursday, September 25, 2008

एक तर्फा मोहब्बत

एक सादे से चेहरे पे मुस्कान उभार के
रौनक बदल गया कोई अरमान उभार के

जैसे सूरज को तकने से है चाँद की ज़ीनत
पेहचानहमारी बन गई उनको निहार के

बस उनके होने से ही खोने का डर गया
और पा लिया सब मैंने सब उनपे निसार के

अब करें क्यूँ आस कोई रहमतों के बारिश की
मिले तनहा गर्मी में जो साथी बहार के

प्यार अगर सिर्फ़ दिल में मेरे हुआ आशिना तो क्या
खो जाते है रिश्तों में बंध रिश्ते हज़ार के

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