Wednesday, November 24, 2010

निसार किसी पे (Nisaar kisi pe)

कोमल कमल पे ठहरी हुई पानी की बूँद जैसी
तेरे गालो पे गीली लट्तें है दिल को सुकून जैसी

तेरी ज़ुल्फों के पर्दे तेरा चेहरा यु छुपाए
अल्हड घटा रूठी जैसे बिन बरसे ही लौट जाए

शाम का ये रंग है क्या जो आसमा पे बिखरा है
या तू ने चूमा बादल कोई जो गुलाब सा निखरा है

खुशबु तेरे रुखस की कस्तूरी से भी ज्य़ादा
दातो तले दबे लब मानो चाँद हुआ आधा

तेरी सौंधी इतनी आहट के उसे दिल से सुन्नी पड़ती है
कान के पीछे रखी लट मुझे गुदगुदाया करती है

आँख चुरा कर वो प्यारी हंसी तेरी दबी दबी
रूह तक को खुश कर दे जो दिखे वो कभी कभी

हर अरकान अदा है खुदा को जो तू कबूल कर दे
जन्नत उसके नाम जो खुदको तेरी हस्रत में मशगूल कर दे

तेरा एहसास ही तो सच है ये जहां तो एक किस्सा है
तू बस मेरी चाहत नहीं मेरे वजूद का हिस्सा है

तेरी तारीफ़ करना मेहेज़ शौक़ नहीं बंदगी है
ये तेरे कसीदे मेरी अज़ान है तेरा प्यार ज़िन्दगी है

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