Wednesday, January 6, 2010

Dil-e-naaraaz

तेरी नाराज़गी बड़ी लम्बी चली
हम थक गए तेरी उल्फत में
शायद अनदेखी की बड़ी ज्यात्तिया
तेरी हमने तेरी चाहत में

हमारी खता अगर है तो भी अदना
पर शौक़ न हमें माफ़ी का है
कि वास्ता नहीं लगता अब बेरुखी से
खफा होना है तेरी आदत में

कि ये क्या की हर वक़्त सुहावना हो
हमें शाम ढले भी जीना होता है
तेरे लिए तब मुस्कुरा नहीं सकते
जब मन हमारा हो दहशत में

पर कहा सुकून पाए तेरे असूस में
तू खुश ख़ुशी को ही ढूंढती है
तो छोड़ दिया तेरे पास प्यासा आना
तू चाहती ही नहीं हमें शिद्दत में

कि फज़ूल का दर्द आँखों में
और घूमे लब पे लिए सवाल कितने
क्या तलाशते रहना तेरी मौजूदगी
क्यू खो जाना है तेरी फितरत में

मैं फिर भी तो बाज़ आया नहीं
कि तेरे परदे ही तो तेरे खुलासे है
एक और नज़म क्यू पेश की मैंने
ऐ जाने वाले तेरी खिदमत में

1 comment:

arun singh said...

Khuda ki insaniyat ke aage ab tak sar jhuka hai

par Teri siyahi ke parwangi pe aaj waqt ruka hai

Tere Gazal ke samne meri harfo ki koi bisat nahi

Aur is par mere Kahayalo ke parat ki koi aukat nahi

So dude, i am enable to comment on this but surely you are recreating the statement: GOOD IS NOT GOOD ENOUGH. You are doing great. keep Rocking and never ever leave writing coz you are good at it